अंतर्मन का कुरुक्षेत्र

 आज फिर रथ पर चढ़ पार्थ है खड़ा कौरवों के सामने 

भगवान को सारथी बना फिर खड़ा है समर के मैदान में ,

कपि से सुशोभित रथ लिए ,

महावीर है वो गांडीव धारी ,

हर अस्त्र से सुशोभित है तूणीर उसका ,

फिर भी क्यों शंका से भरा है 


शत्रु की सेना में देखो, बड़ा भयानक दृश्य है ,

कौरवों की सेना का प्रत्येक सैनिक स्वयं पार्थ है  

पितामह भीष्म से लेकर आचार्य द्रोण तक , 

महारथी कर्ण से लेकर दुर्योधन के सोवें अनुज तक , 

प्रतीत ऐसा क्यों होता है उसे कि,

अस्त्र शास्त्र लेकर स्वयं का शत्रु बन , 

हर रथ पर स्वयं ही खड़ा है 


विचलित हो मुरलीधर से बोले महारथी , 

है कोई माया ये शत्रु की या है भ्रम मेरी ही बुद्धि का ,

दीखता मुझे ऐसा क्यों , मनो सामने हर रथ पर मैं ही खड़ा 

मार्गदर्शन करो प्रभु क्या करूँ अब ये बताओ 


सुन धनंजय के यह शब्द मुस्कुराकर बोले मुरारी , 

ना ये भ्रम है ना  है माया , ये तो साक्षात् सत्य है 

कौरवों के रूप में जो समक्ष खड़ा तेरा ही वो अंश है, 

ये तेरा ही लोभ, तेरा अधम है , 

तेरी ईर्ष्या  तेरा अहं  है , 

तेरे सामने आज तेरा ही भय है 


हो संशय अब भी तो देख मेरी ओर  तू 

देखा पार्थ ने फिर बिहारी को , पर दृश्य अब ये था अनोखा ,

बनकर चतुर्भुज अब चक्रधारी भी वो स्वयं ही था 


फिर मुस्कुराकर बोले जगतपति 

है द्वंद आज तेरा तुझसे ही 

करले विजय अपने लोभ को ईर्ष्या , भय और अहं को 

उठा गांडीव और आरम्भ कर युद्ध अब 

कुरुक्षेत्र की पावन भूमि आज तेरे ही अंतर्मन में है  


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